अमृता प्रीतम जिनका लिखा वक़्त की देहलीज़ कभी बाँध न सकी।'s image
Article9 min read

अमृता प्रीतम जिनका लिखा वक़्त की देहलीज़ कभी बाँध न सकी।

Kavishala DailyKavishala Daily November 1, 2021
Share0 Bookmarks 60 Reads0 Likes

इंसान अपने अकेलेपन से निजात पाने के लिए

  मोहब्बत करता है,

  और मुहब्बत इस बात की तस्दीक करती है कि

  उसका अकेलापन अब ताउम्र कायम रहेगा।

-अमृता प्रीतम


आपमें से शायद ही कोई ऐसा हो जो आज के समय में आग की तरह फैले रील्स बनाने के शोख से परिचित न हो। हाल ही के दिनों में अभिनेत्री तापसी पन्नो द्वारा एक अवॉर्ड शो में अपने ढंग से पढ़ी गयी कविता पर नजाने कितने ही लोगो ने रील्स बनाई तो और लाइक्स कमेंट करने का आग्रह किया। अब जानना ये जरुरी है की अभिनेत्री तापसी पन्नो द्वारा पढ़ी वो कविता थी क्या ?

कविता कुछ इस प्रकार थी : 

मैं तैनु फिर मिलांगी 

तेरे मत्थे की लकीरे बन 

तैनु तकदी रवांगी 

पर मैं तैनु फिर मिलांगी !


तापसी पन्नो द्वारा पढ़ी ये कविता वास्तव में सुप्रसिद्ध कवयित्री अमृता प्रीतम ने लिखी थी जिनकी लेखनी पर समय की धुल का कोई असर नहीं पड़ा और इस बात का साक्षात प्रमाण है उनकी कविता का आज के दौर में भी यूँ प्रचलित होना। 


एक थी प्रीतम

अपनी कलमकृति से वो मकाम हासिल करने वाली जहाँ पहुंचने के लिए नजाने कितनी ही उम्रों की जरुरत पड़ जाती है ,'मैं तेनु फिर मिलांगी' लिखने वाली जो खुद के बारे में कहती थीं परछाइयाँ पकड़ने वालों छाती में जलने वाली आग की परछाइयाँ नहीं होती ,पंजाबी और हिंदी की मशहूर लेखिका अमृता प्रीतम।जिस और आज़ादी के लिए क्रांतिकारी जत्थे तैयार किया जा रहे थे उसी के पलट अंग्रेज अपने शत्रुओं से लोहा लेने के लिए भारतियों की फौज में भर्ती कर उन्हें बाहर भेज रहे थे। हम बात कर रहें हैं पहले युद्ध से तकरीबन ५-७ साल पहले की। कई भारतीय नौजवानो को युद्ध की आग में झोंक दिया गया। कई गए पर लौट कर कभी नहीं आए। उन्ही में से था एक गुजरात की राजबेदी का शोहर जो युद्ध की आग में गया पर उसकी राख तक ना वापिस लौटी। ऐसे में अपनी जिंदगी को नया लक्ष्य देने के लिए ने स्कूलों में पढ़ाने का कार्य शुरू किया। लाहौर के गुजरावाला में अपनी विधवा भाभी के साथ रोज एक डेरे में माथा टेकने जाती और स्कूल चली जाती। एक दिन डेरे में एक नौजवान साधू पर नजर पड़ी जो संस्कृत, वृज भाषा और साहित्य का अच्छा जानकार था पर अपनी निजी जिंदगी में लगे ठोकरों से साधू बनने की राज में चला आया था। राजबेदी से मुलाक़ात ने एक बार फिर जिंदगी जीने की इक्षा को प्रबल कर दिया दोनों ने शादी की और नन्द स्वामी अब क़तर सिंह पियूष बन गए। पियूष का अर्थ होता है अमृत इस कारण जब दस वर्ष के लम्बे इंतजार के बाद घर में बेटी आयी तो उसका नाम रखा गया अमृता । घर में धार्मिक माहौल रहा परन्तु १० वर्ष बाद जब अमृता १० साल की हुई उनकी माँ का साया उनके ऊपर से उठ गया ,घटना के बाद पिता ने दुबारा संन्यास लेने का फैसला किया। परन्तु इस बार अमृता के रिश्ते न उन्हें रोक लिया। 

कतार कविताएं कहानिया और जीत रात-रात भर जाग कर लिखा करते थे। जिसका सीधा असर अमृता पर हुआ। हांलाकि घर में हमेशा से धार्मिक माहौल रहा परन्तु वो धार्मिक सोच ले कर नहीं लिखती थीं .जब उनकी माँ बीमार थी तब उनकी सहेली ने कहा था की आंख बंद कर सच्चे दिल से भगवान से माँ के अच्छे स्वस्थ्य की प्राथना कर वो ठीक हो जाएंगी क्यूंकि बच्चो की बात ईश्वर जरूर सुनता है अमृता न घंटो प्राथना की परन्तु नियति को कुछ और मंजूर था अमृता की माँ का देहांत हो गया। इस घटना का बच्ची अमृता के दिमाग पर खासा असर पढ़ा ईश्वर की वास्तविकता पर से विश्वास उठ गया। पिता की धार्मिक परंपरा का पालन करना बंद कर दिया। पिता से तर्क वितर्क करने में भी पीछे नहीं रहती। अमृता ऊंच-नीच के खिलाफ अकेले ही मोर्चा सँभालने का कार्य करती थी। बचपन में जब ये देखा की नानी छोटी जाती के लोगो के लिए अलग और अपने घर के लोगो के लिए अलग बर्तन रखी हैं ये बात अमृत को नागवारा गुजरी और घर में ही बवाल कर दिया की मुझे खाना मिले तो उसी बर्तन में मिले। खैर बेटी की जिद्द के आगे सब धरा का धरा रह गया और सभी बर्तन समान हो गए। सोलह साल की उम्र में ही उनका पहला लेखन अमृत लहरें बाज़ार में आई और इस यात्रा का जयघोष हुआ। शायद इसलिए सोलवेह साल को वो सबसे महत्त्वपूर्ण बताती थी।

अपनी आत्मकथा रसीदी टिकट में वो लिखती हैं :

सोलवेह साल में मेरा परिचय उस असफल प्रेम की तरह था जिसकी काशक हमेशा के लिए वहीँ पड़ी रह जाती है। शायद इसीलिए ये सोलह साल मेरी जिंदगी के हर साल में कहीं न कहीं शामिल है। 

उम्र की संख्या बढ़ी और शादी का वक्त आ गया पिता ने अमृता का विवाह सरदार प्रीतम से कर दिया जो बचपन में ही तय की जा चुकी थी और अमृता के साथ जुड़ गया प्रीतम ,अमृता प्रीतम। हांलाकि आज हम अमृता को अमृता प्रीतम के नाम से ही जानते हैं जो उनके साथ जिंदगी भर रहा और जिंदगी के बाद भी है पर वो रिश्ता तभी टूट गया। १९६० में रिश्ता टूटा और उस दौर में तलाक का जहाँ जिक्र भी अभिशाप माना जाता था तलाक हुआ और रास्ते अलग हुए।अमृता का लेखन में समय बीतने लगा और रचनाओं की संख्या बढ़ने लगी हांलाकि अमृता २ बच्चो की माँ भी बन चुकी थी। यात्रा में एक उपन्यास प्रकाशित हुआ पिंजर जिसने पुरे महादीप में अमृता प्रीतम नाम की धूम मचा दी। अमृता ने देश के विभाजन को बेहद करीब से देखा था उन हालातों को भुखमरी गरीबी को जो आक्रोश बन उनकी इस उपन्यास में उन्होंने डाला। इस उपन्यास पर आधारित एक फिल्म का भी निर्माण किया गया जो विभाजन पर बनी सर्वश्रेष्ठ फिल्मो में से एक रही। भारत आयीं जहाँ दिल्ली में रहते हुए कई उपन्यास ,कविताएं कहानियों की झरि लगा दी। 

प्रीतम अपना दिल शाहिर के नाम पहले ही कर चुकी थीं। शाहिर ने उसी दौरान एक नज़म लिखी ताज महल और उसे शानदार फ्रेम में बनवा कर अमृता को भेट की जिसे अमृता ने जिंदगी भर कलेजे से लगा कर रखा।उस नज़म के कुछ हिस्से आपके समक्ष प्रस्तुत है :    

अनगनित लोगो ने दुनिया में मोहब्बत की है कौन कहता है सादिक न थे जज्बे उनके लेकिन उनके लिए तश्हीर का सामान नहीं क्यूंकि वो लोग भी अपनी ही तरह मुफ्लीस थे ये चमंजार ये जमना का किनारा ये महल ये मुनक़्क़श डरो दीवार ये महराब ये ताक एक शहंशा ने दौलत का सहारा लेकर हम गरीबो का उड़ाया है मज़ाक मेरे महबूब कहीं और मिला कर मुझसे। 

वक़्त बीतता गया दोनों महानगरी जा बेसे कभी-कभी मिला करते पर कभी रास्तो को साझा नहीं किया। ख़ैर नए अंदाज़ और अलग तरीके से अपने प्यार को रखाकविताओं ,उपन्यासों और किस्सों में उम्र बिता और हिंदी और पंजाबी साहित्य में अपने चमकता नाम दर्ज कर दिया। ३१ अक्टूबर को 86 वर्ष की उम्र में उनके जाने से एक युग का अन्त हुआ है। अमृता प्रीतम की कवितायें प्रेम और संवेदनाओं से भरी होती थी।लेखन साहित्य ने उनके दिये योगदान को सहेज़ कर रखा है । 

उनकी कविता दाग़ आपके समक्ष प्रस्तुत है :



मौहब्बत की कच्ची दीवार

लिपी हुई, पुती हुई

फिर भी इसके पहलू से

रात एक टुकड़ा टूट गिरा


बिल्कुल जैसे एक सूराख़ हो गया

दीवार पर दाग़ पड़ गया...


यह दाग़ आज रूँ रूँ करता,

या दाग़ आज होंट बिसूरे

यह दाग़ आज ज़िद करता है...

यह दाग़ कोई बात न माने


टुकुर टुकुर मुझको देखे,

अपनी माँ का मुँह पहचाने

टुकुर टुकुर तुझको देखे,

अपने बाप की पीठ पहचाने


टुकुर टुकुर दुनिया को देखे,

सोने के लिए पालना मांगे,

दुनिया के कानूनों से

खेलने को झुनझुना मांगे


माँ! कुछ तो मुँह से बोल

इस दाग़ को लोरी सुनाऊँ

बाप! कुछ तो कह,

इस दाग़ को गोद में ले लूँ


दिल के आँगन में रात हो गयी,

इस दाग़ को कैसे सुलाऊँ!

दिल की छत पर सूरज उग आया

इस दाग़ को कहाँ छुपाऊँ!

 ज़िन्दगी तुम्हारे उसी गुण का इम्तिहान लेती है,

  जो तुम्हारे भीतर मौजूद है मेरे अन्दर इश्क़ था

-अमृता प्रीतम


No posts

Comments

No posts

No posts

No posts

No posts