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1930 के दशक में महिला सशक्तिकरण का उत्कृष्ट उदाहरण -कमलादेवी चट्टोपाध्याय

Kavishala DailyKavishala Daily October 30, 2021
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"मुझे लगता है महिलाओं की भागीदारी 'नमक सत्याग्रह' में होनी ही चाहिए और मैंने इस सम्बन्ध में सीधे महात्मा गांधी से बात करने का फैसला किया है।"

-कमलादेवी चट्टोपाध्याय 


आज महिलाओं को सभी अधिकार सम्मान पूर्वक दिए जाते हैं अधिकार शिक्षा का हो नौकरी का या चुनाव में वोट देने या स्वयं चुनाव लड़ने का। पर १९३० दशक का वो वक़्त जब महिलाओं को परदे के पीछे घरों की चार दीवारिओं के भिरत केवल खाना बनाने और घरों के कार्य करने लायक समझा जाता था उस दौर में एक ऐसी महिला परदे को चीरती हुई समाज के समक्ष महिला सशक्तिकरण का सबसे बड़ा उदाहरण बनकर आई जिन्होंने स्वतंत्रता संग्राम में महिलाओं की भागीदारी का बेडा उठाया और महिलाओं को जागरूक करने का कार्य किया। सामाज में एक क्रांति लाने का कार्य किया हम बात कर रहे हैं चुनाव में खड़ी होने वाली स्वप्रथम भारतीय महिला की जो एक समाजसुधारक , स्वतंत्रतासेनानी तथा लेखक थीं कमलादेवी चट्टोपाध्याय । गांधीवादी विचारधारा रखने वाली कमलादेवी १९२३ में असहयोग आंदोलन का हिस्सा बनने के लिए लन्दन से भारत लौटी थीं जिसके बाद उनकी मुलाकात मार्गेट कजन्स से हुई जो काफी प्रभावशाली रही। कमलादेवी ने कजन्स द्वारा स्थापित संस्था ऑल इंडिया विमेंस कांफ्रेंस (all india womens conference ) के महासचिव की ज़िम्मेदारी संभाली। उस वक़्त में महिलाओं को चुनाव लड़ने का अधिकार नहीं था ऐसे में कमलादेवी ने महिलाओं को चुनाव लड़ने का अधिकार दिलवाने के लिए संघर्ष किया जो सफल हुआ और १९२६ में मद्रास प्रांतीय विधान परिषद् के लिए चुनावों के ऐलान होने से पूर्व महिलाओं को भी सम्मानपूर्वक चुनाव लड़ने का अधिकार मिला। हांलाकि कमलादेवी वो चुनाव जीत नहीं पाई परन्तु उनकी सबसे बड़ी जीत महिलाओं को मिला उनका अधिकार ही था। 

कमलादेवी के पति एक बहुत प्रसिद्ध नाटककार और कवि थे कमलादेवी चट्टोपाध्याय - ए बायोग्राफी किताब में लेखक रीना निंदा ने हर घटना को विस्तारपूर्वक लिखा है कैसे चुनाव लड़ने की अनुमति मिलते ही कमलादेवी के पति ने सभी के साथ मिलकर कई अलग-अलग नाटकों व् गीतों से जोरदार प्रचार किया था। इसका बाद १९२७ -१९२८ में कमलादेवी ऑल इंडिया कांग्रेस कमेटी की सदस्सय बनी। नारीवादी कमलादेवी ने समाज में पसरी कई विसंगतिओं को जड़ से खत्म करने के लिए संघर्ष किया बालविवाह जैसी कुप्रथा के विरूद्ध सहमति की उम्र जैसे कानूनों को लागू करने की मांग की। रजवाड़ों में आंदोलन पर कांग्रेस की निति तय करने में मुख्य भूमिका निभाई थी। कमलादेवी की महिलाओं को लेकर जागरूकता का अनुमान इसी घटना से लगाया जा सकता है जब वे महात्मा गांधी के 'नमक सत्याग्रह आंदोलन' में महिलाओं की भागीदारी को सुनिश्चित करवाने के लिए महात्मा गांधी से मिलने तत्काल ट्रैन में चढ़ गई थी जब महात्मा गांधी अपने सफर पर कहीं जा रहे थे। इतना ही नहीं कमलादेवी इतनी साहसी महिला थीं कि वे नमक सत्याग्रह के बाद 'फ्रीडम साल्ट' लेकर पहले स्टॉक एक्सचेंज और फिर हाई कोर्ट पहुँच गई और जज को भी 'आजादी का नमक' बेचने से नहीं कतराई। जिस दौर में महिलाओं को फिल्मो से कोसो दूर रखा जाता था उस वक़्त में कमलादेवी चट्टोपाध्याय ने कन्नड़ भाषा की प्रथम मूक फिल्म 'मृच्छकटिका' में अभिनय किया और फिल्मो से महिलाओं की मनाही की इस विचारधारा को खत्म करने का कार्य किया। कमलादेवी ने लोककलाओं ,शास्त्रीय कलाओं के लिए एक बड़ा योगदान दिया है। 'इंडियन नेशनल थिएटर' की स्थापना करने वाली भी और कोई नहीं बल्कि कमलादेवी चट्टोपाध्याय ही थीं इसके साथ-साथ 'संगीत नाटक अकादमी' की स्थापना करने का कार्य भी उन्होंने ही किया है। वही हस्तकला के नवजागरण में विशेष भूमिका निभाने का कार्य किया। 

बात करें कमलादेवी के निजी जिंदगी की तो उनके पिता कलेक्टर थे जिनकी मृत्यु के उपरांत जबरदस्ती कमलादेवी का बालविवाह करवा दिया गया जिसे ना मानते हुए कमलादेवी चट्टोपाध्याय ने स्वयं सरोजिनी नायडू के भाई हरिंद्रना चटोपाध्याय से विवाह कर लिया हांलाकि उनके द्वारा उठाए इस कदम को समाज ने स्वीकार नहीं किया और उनकी शादी पर कई सवाल उठा दिए। 

कमला देवी एक लेखक भी थी एक लेखक के रूप में भी उन्होंने अपना योगदान दिया। उन्होंने महिलाओं से जुड़े मुद्दों को अपने लेखनी का आधार बनाया। महिलाओं से जुड़े मुद्दों पर उनकी स्वप्रथम किताब १९२९ में प्रकाशित ही वहीँ उनकी लिखी आखरी किताब भी स्वतंत्रता आंदोलन में महिलाओं के संघर्ष पर आधारित थी जो दिखता है की उन्होंने अपना सम्पूर्ण जीवन महिला सशक्तिकरण में बिताया। 'द अवेकिंग ऑफ़ इंडियन वोमेन' ,जापान इट्स विकनेस एंड स्ट्रेंथ , इन वॉर-टॉर्न चाइना उनकी लिखी कुछ चर्चित किताबें हैं। लेखन कार्य में उनका भी एक बड़ा योगदान रहा है।

देश के आज़ादी के बाद कमलादेवी ने राजनीति की तरफ रुख नहीं किया बल्कि समाजसुधार और समाज के उधार की दिशा में अपना कार्य किया। २९ अक्टूबर १९८८ ८५ वर्ष की उम्र में उन्होंने अपनी आखरी सांस ली और दुनिया से विदा लिया। आज वे हमारे बिच नहीं हैं परन्तु उनकी कहानियां उनका साहस समाज के लिए एक प्रेरणा का कार्य करता है और निरंतर करता रहेगा। २०१७ में स्मृति ईरानी द्वारा अंतराष्ट्रीय महिला दिवस के अवसर पर महिला बुनकरों एवं शिल्पियों के लिए कमलादेवी चट्टोपाध्याय राष्ट्रीय पुरस्कार शुरू करने की घोषणा की गयी। 

अपने योगदान और कार्य के लिए कमलादेवी चटोपाध्याय को कई उल्लेखनीय सम्मानों से सम्मानित किया जा चूका है जिनमे १९६६ में रेमन मैग्सेसे पुरस्कार १९५५ में पद्म भूषण और १९८७ में पद्म भूषण जैसे प्रतिष्ठित सम्मान शामिल हैं। 




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