तुख्म-ए-इश्क़'s image
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खूँ रुलाएँगे हमें कब तलक, जाने ये ज़ख़्म-ए-इश्क़?

दिल भी अपना ही गया और, हमीं पे होते ज़ुल्म-ए-इश्क़

वो सूख गए, सींचते थे, आब-ए-चश्म से,

हमने कभी बोए थे जो, सीने में तुख्म-ए-इश्क़



महफ़िल में हुआ ज़िक्र, वफ़ा का जो सारी रात

ख़ामोश गुज़रती रही, उस रात बज़्म-ए-इश्क़


याँ तो हर एक जज़्बात को, लफ़्ज़ों की ज़रूरत

याँ हमको नज़र आती है, कुछ और रस्म-ए-इश्क़


एक पल के मराशिम को भी, तरसी थी जो कभी,

अब ज़िक्र-ए-मराशिम पे भी, रोती है चश्म-ए-इश्क़


रूदाद-ए-ग़म भी ऐसा, कि कैसे कहें “कौशल”

जब इश्क़ अधूरा, तो अधूरी है नज़्म-ए-इश्क़




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