दर्द-ए आशोब's image
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कुछ दिल भी हो रंजीदा, कुछ ख़ुद से ठनी हो

जब आग भी लगी हो, और ठंडक भी बड़ी हो

कैसे ना हर एक लफ़्ज़ से, मिलता हो तेरा अक़्स

जो सियाही ही आब-ए-चश्म के रंगों से बनी हो



गिरते ही, आब-ए-तल्ख़, भड़क उठते हैं शोले,

आग बुझती कहाँ है, आग जो सीने में दबी हो


हमको ना सिखाना सनम, अन्दाज़-ए-गुफ़्तगू,

हम बात वही कहते हैं, जो दिल पे लगी हो


बात हमसे न करो, अहद-ए-वफ़ा की अभी यहाँ,

तज़क़िरा इतना ज़रूरी है तो फिर और कहीं हो


ये है ख़ल्क़त-ए-शहर, किसी सूरत ना सुनेगी,

कितनी शिद्दत से भले, दर्द-ए आशोब उठी हो

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