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इक टुकड़ा आसमां से...

Karmendra ShivKarmendra Shiv March 21, 2022
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हां ज़लज़ला भी आया, डुबाया नदी ने फिर,
इक टुकड़ा आसमां से, मांगा ज़मीं ने फिर।

किससे कहें के हम, बड़े बेआबरू हुए,
शीशे के उस तरफ़ से, घूरा किसी ने फिर।

टूटा हुआ वो ख़ुद है, देगा किसी को क्या,
फिर टूटा एक सितारा, मांगा किसी ने फिर।

हैं ख्वाहिशें हजारों, चलना है बहुत पर,
जकड़ा हुआ है जैसे, मेरी बेबसी ने फिर।

लगता है फिर लिखूंगा, कुछ शेर अधूरे,
आगोश में लिया है, ग़म ए ज़िंदगी ने फिर।

~कर्मेंद्र

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