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" वाक़ई जहाँ कोई नहीं रहता "- कामिनी मोहन।

Kamini MohanKamini Mohan May 9, 2022
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" वाक़ई जहाँ कोई नहीं रहता "

वाक़ई जहाँ कोई नहीं रहता
वहाँ ज़िंदगी के गीत गुनगुनाने
आँखों को फेर चलीं
आख़िरकार सब अधूरा छोड़कर क्यूँ चलीं।

सुनना, बोलना, तोल कर फिर बोलना
सदाओं का पीछा करना
तराज़ू के पलड़े के साए में
सब चीज़ों को रखना।

जो थे अधिक
उनका हाथ पकड़ना,
जो थे कम उन्हें कंधे पर बिठाना।

फिर क्यूँ बेज़ुबान बनकर
जाते वक़्त सब छोड़ चली,
तराज़ू के पलड़े को तोड़ चली।

उसके होने से दीवारों का था होना
घर के कोनों का था अपना बिछौना।

उसके होने से होता था आँगन
ख़ुशबू तुलसी की थीं मनभावन
दीए की लौ में चाँदनी-सा खिलता मन।

जिसके होने को आशीर्वाद
न होने को अभिशाप माना जाता है
जिसे किसी शब्द में नहीं गढ़ा जाता है।

आवाज़ संग,
उतर आती थीं।
हर बार जाकर भी,
लौट आती थीं।

पर इस बार
ख़ुशबू संग हवाओं में घुलकर
वक़्त से सिमटकर
क्षितिज के पार चलीं।

कोई कविता नहीं,
जिस पर लिखा जा सके।
जहाँ वो रहती थीं,
उस हृदय के कोटर में जाया जा सके।

ऐसा कोई ज्ञानी नहीं,
कोई ध्यानी भी नहीं।
जिसके लिए
विचार मददगार हो सके।

माँ का वात्सल्य जिसे कहते हैं
उसके बग़ैर संसार में
एक प्रेम,
एक स्नेह रुपी
स्व के सागर को पाया जा सके।

-© कामिनी मोहन पाण्डेय।
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