उस पार अक्षर आवास में
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उस पार अक्षर आवास में - © कामिनी मोहन।

Kamini MohanKamini Mohan August 11, 2022
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कब तक!
कहाँ तक!
पता नहीं!
नश्वर है सबकुछ
कर्म-अकर्म, विकर्म पर
ज़्यादा विमर्श किया नहीं।

काल के परे मैं नहीं हूँ
रोटी, कपड़ा और मकान तक
ही सीमित हूँ।

सालों साल की ज़ोर आज़माइश
यहाँ क्षणभंगुर रही हर फ़रमाइश।

लिख कर ले जाऊँगा
भरकर दोनों हाथों की मुट्ठियाँ,
तरह-तरह के भावों से
भरीं सब अधूरी चिट्ठियाँ।
काल के उस पार के आवास
जिसका अभी तक नहीं है
कोई पता मेरे पास।

यथार्थ मैं देख रहा हूँ
अण्डज, पिण्डज, स्वेदज, उद्भिज
सब हैं क्षणभंगुर देह-वास में
मानने को विवश हूँ!
अक्षर ब्रह्म से जन्मे सभी
विलीन हो रहे अक्षर आवास में।

अनश्वर के साए में
नश्वर है सबकुछ
मैं काल के अधीन
क्षणभंगुर ही हूँ।
पहले भी नहीं था
आगे भी नहीं हूँ।
-© कामिनी मोहन पाण्डेय।

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