कहने तक
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कहने तक -© कामिनी मोहन।

Kamini MohanKamini Mohan August 11, 2022
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कुछ तलाश करते
हम सब चल रहे।
चलते-चलते
बंद रास्ता दिखे तो
रास्ता बदलकर आख़िर तक
चलने की कोशिश कर रहे।

हैं जो रूके हुए
वे भी साँसों की आवाज़े सुन रहे।
हैं छायाएँ ख़ाली पर
सरसराहटों को बुन रहे।

चले या रूके
अंततः सब ख़ारिज स्मृतियाँ
यूँ ही पड़े-पड़े
काग़ज़ों के बोझ में बदल जाएँगी।
गुज़रे लोगों की
भावुकतापूर्ण समीक्षाएँ
जो कुरेदी हुई थीं
पहचान को तरस जाएँगी।

ऐसे में कविता का पूरा तंत्र
बहस करने और झगड़ने पर भी
अनिर्णित रह जाएँगा।
उच्च और निम्न स्तरों का अंतर्विरोध
नवीनता की लयबद्ध गति को
रोककर बुनियादी शर्त को
ढूँढ़ता रह जाएँगा।

क्योंकि बहुत कुछ लिख लेने के बाद भी
बहुत कुछ अनलिखा रह जाता है।
और जो कुछ अनकहा रहा
वो सफ़र में कहने तक रह जाता है।
- © कामिनी मोहन पाण्डेय।

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