"इस बाग़ का फूल"
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"इस बाग़ का फूल" -© कामिनी मोहन

Kamini MohanKamini Mohan August 12, 2022
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इस बाग़ का फूल गोलियों से छलनी हुआ था,
चीख़-पुकार सुनकर गगन कम्पित हुआ था।

ख़ून  से  लथपथ बाग़ आज भी पड़ा हुआ है,
दाग़ देखकर रोता हैं दिल आँसू थमा हुआ है।

क्यूँ आह नहीं सुनी जो तड़तड़ गोलियाँ बरसाता था,
निहत्थे बच्चों, बूढ़ों, महिलाओं को मार गिराता  था।

हत्यारा जनरल डायर अहंकार से इतराता था,
कहा रास्ता संकरा था, नहीं तो, मैं तोप चलवाता था।

रौलेट का विरोध जालियाँवाला बाग हत्याकाण्ड कहलाता है,
ब्रिटिश शासन का कलंक हिन्दुस्तान भूल नहीं  पाता है।

छह सप्ताह के कोमल बालक मरे यहाँ गोली खाकर,
वृद्ध, महिलाएँ,  कोमल  बच्चे  मरे  तड़प-तड़पकर।

बाग़ में मरने वालों ने बलिदान कर डाला,
ब्रिटिश शासन के अंत का प्रारम्भ कर डाला।

पुष्प चढ़कर दीया जलाकर  तड़पकर कहता हूँ,
स्वतंत्रता हैं सबसे बड़ी चीज़ हर मनुष्य से कहता हूँ।
-© कामिनी मोहन पाण्डेय।

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