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हताश, मर्मांहत अंतर्द्वंद्व - कामिनी मोहन।

Kamini MohanKamini Mohan May 19, 2022
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हताश, मर्मांहत अंतर्द्वंद्व
टूटती-बिखरती छली हुईं।
जीने की उत्कंठा में जुडती,
निःस्तब्धता अँधियाली हुईं।

समृद्धि सुख की कामना में,
दु:ख उर बीच संजोतीं।
निर्जन परिक्षेत्र में बस,
क्या कुछ चाहिए सोचतीं।

ज़ख्म खुरचे तो,
आत्मीयता निहारतीं।
झाँककर निर्निमेष,
मुग्ध हो पुकारतीं।

काल से कहतीं,
अनुग्रह न करे।
भाव शून्यता है यहाँ,
प्रतिध्वनि न करे।

चौतरफ़ा है नफ़ासत यहाँ
विह्वलता एक पल नहीं।
सोएँगे सब उद्गम यहाँ,
मैं स्वाधिकार कुशल नहीं।
- © कामिनी मोहन पाण्डेय।

नफ़ासत - सुंदरता, कोमलता 

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