186."कला मूलतः एक आत्मिक और नैतिक चेष्टा है"

- © कामिनी मोहन।'s image
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186."कला मूलतः एक आत्मिक और नैतिक चेष्टा है" - © कामिनी मोहन।

Kamini MohanKamini Mohan October 18, 2022
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कला स्वभाव से जन्मी एक नियमबद्ध अनुकृति है।कला सदैव मनुष्यकृत नियमों का समर्थन करती है।कला प्रकृति के सौन्दर्यात्मक पक्ष के सद्व्यवहार का अनुकरण करती है। यदि जीवन से कृत्रिमता को निकाल दिया जाय तो जो दृश्य रूप-रंग लेकर शोभायमान होता है, वह स्वत:स्फूर्त कला है। कला जीवनाशक्ति का परभृत प्रतिबिंब है।
दर-अस्ल, समूचे ब्रह्माण्ड में लय है। हमारी धड़कन में लय है हमारे रक्त प्रवाह में लय है। पूरी प्रकृति लय में है, इसीलिए, प्रत्येक वस्तु लय में ही अभिव्यक्त होती हैं।
गायन, वादन, नृत्य में लय है। सब एक ही चेतना शक्ति से ओतप्रोत है। जहाँ जितनी जरुरत है वहाँ उतनी शक्ति दिखती है। पशु, पक्षी, नर-नारी, देवता गण सभी ख़ुशी को अपनी आवाज़ और भाव-भंगिमाओं से प्रकट करते हैं। सब एक लय में नृत्यरत दिखते हैं। इस लय का मानस में प्रयोज्य प्रयोग से कला प्रतिष्ठित होती है।
हर कला में रचनात्मक पहचान लिए साहित्य है। यह मनुष्य की चेतना का सरल उद्दीपन है। साधना-आराधना और प्रेम के कारण मानस में उपजी कला केवल एक लफ़्ज़ नहीं है। यह एक पूरा फ़िक़्रा है। कलाकार, फ़नकार, नग़्मा-निगार जनमानस में प्रेम का एहसास पैदा करता है। उसके द्वारा परोसे गये लफ़्ज़ रूहों को जोड़कर पुल बनाते हैं। इस पुल से अनेको फ़नकार अनेको पीढ़ियों तक गुज़रते हैं, और अनगिनत रूहों तक कला की किरण पहुँचाते हैं।
कविता में काव्यात्मक-कला की उत्पत्ति का परम कारण जीवन का लय है। यह लय सदैव चैतन्य भाव में दृष्टिगोचर होता है। यह उच्च भावना को उद्भुत कर मनुष्य की विशिष्टता को ज़बान देकर अभिव्यक्त होता है।
धरती पर ऐसा कोई प्राणी नहीं है जो अपने अंतस् से उठे हर्षानंद एवं विषाद को अभिव्यक्त न करता हो। इसीलिए हर कहीं छिपे हुए भाव की अभिव्यक्ति और प्रभावहीन हो रहे मनुष्यता में प्रभावोत्पादक तत्व का सृजन कविता बन जाता है। अभिव्यंजना में लफ़्ज़ों का क़ाग़ज पर चित्रण जीवन को जागृत करता है। यह लालित्यपूर्ण, लावण्ययुक्त, विश्लेषणात्मक, आध्यात्मिक और आभ्यान्तरिक है। इन सबका एकाकी लक्ष्य जीवन के आदर्श का अंकन है।
प्रेम की समाहिति होने के कारण कला हमेशा ही  ख़ूबसूरत रही है। यह मनुष्य को मनुष्य से बग़ैर किसी अर्थ के जोड़ती है। कला मूलतः एक आत्मिक और नैतिक चेष्टा है। यह काल के बृहत्तर परिप्रेक्ष्य में उत्पन्न सोच को सामने रखती है।

-   छायाचित्र-कामिनीमोहन।

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