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Kumar VishwasPoetry1 min read

शिखर तक पहुँचने की लगी है जो एक होड

Jitendra SinghJitendra Singh December 28, 2021
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शिखर तक पहुँचने की लगी है जो एक होड,

कैसे कोई रख सकता इसमें सबको साथ जोड़

जो ढूँढने निकले हम इसका एक निराला सा तोड,

पता चला, केवल अपनी संस्कृति ही है इतनी बेजोड़ !!


देख हमें कह सकता कौन, प्राचीनतम संस्कृति है हम,

घनी तिमिराई में भी फैलाते उजियारा नवीनतम है हम,

हर दिन जहां उत्सव सा हैं हर दिल जिसमें जवाँ सा है,

प्रकृति का स्वागत करता आता साल इसमें नया सा है!!

 

दीप जलाते, रंग लगाते, भांति भांति से जश्न मनाते हम,

घर घर बनते पकवान, घर घर छायी रहती धूम,

होली, दिवाली, वैशाखी, राखी, गुड्डी पड़वा और ओणम

देखा, सम्पूर्ण वर्ष में न जाने कितने त्योंहार मनाते हम!!

 

जहाँ मात पिता के चरणों में हर दम किया जाता वंदन,

जहां जन्मे दशरथ के लाल, जहाँ जन्मे देवकी नंदन,

जहाँ सीख दी जाती सर्वदा ही वसुधैव कुटुम्बकम्,

प्रभु धन्य हूँ जो इस महान धरा पे पाया मैंने जन्म!!

Jeet




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