शहीदी दिवस चार साहबजादे और माता गुजरी को समर्पित's image
International Poetry DayPoetry5 min read

शहीदी दिवस चार साहबजादे और माता गुजरी को समर्पित

JAGJIT SINGHJAGJIT SINGH December 27, 2021
Share0 Bookmarks 21 Reads0 Likes

आज उन महान गुरु श्री गुरु गोबिंद सिंह के चार साहिबजादों और माता गुजरी की ज़िन्दगी की दास्तान प्रभु,नीलू दीदी और मेरी मां अपने बेटे सनी से लिखवाने वाले है।जब पढ़ेंगे साफ़ दिल वाले तो उनकी आंखों से आंसू जरूर निकलने वाले है।

  

1704आनंदपुर साहिब किले पर मुगल सेना और गुरु गोबिंद सिंह जी की फ़ौज के बीच किला छोड़ने को लेकर हमला हुआ।


ना चाहते हुऐ भी गुरु गोबिंद सिंह जी का पूरा परिवार एक दूसरे से हमेशा हमेशा के लिये जुदा हुआ।


बाबा अजीत सिंह और बाबा जुझार सिंह अपने पिता गुरु गोबिंद सिंह जी के साथ निकल पड़े।


कौन भूल सकता है वो चमकौर के युद्ध को जब दोनों बड़े साहबजादे किस बहादुरी से थे लड़े।

देख के इन दोनों के होंसले मुगल सेना के होश थे उड़े।


तीर हुऐ थे दोनों साहेबजादो के पास खत्म।

लेकिन इतनी बहादुरी से दोनों भाई लड़े थे दिखा दिया था इन्होंने गुरु गोबिंद सिंह के बेटों में कितना है दम।


तलवारें भी टूटी।

लेकिन लड़ते रहे तब तक जब तक जिस्म से आखरी सांस ना छूटी।


मुगल सेना को ऐसी धूल चटाई।

अंत में लड़ते लड़ते दोनों बड़े साहबजादो ने शहीदी पाई।


नोकर गंगू माता गुजरी और दोनों छोटे साहबजादो को अपने घर लेकर के आया।

माता गुजरी और दोनों छोटे साहबजादो मेरे घर पर ठहरे हुऐ है ये बात खुद मुगल सेना को बता कर भी था आया।


कितना गिरा हुआ था नौकर गंगू थोड़े से ईनाम पाने के लालच में उसे माता गुजरी और दोनों छोटे साहबजादो

 बाबा ज़ोरावर सिंह जी और बाबा फतेह सिंह पर ज़रा भी तरस ना आया।


उसी वक्त वज़ीर खान ने उन्हें बंदी बना कर महल में लाने का हुक्म सुनाया।


मुगल सेना ने माता गुजरी और दोनों छोटे साहबजादो को बंदी बनाया।


फिर ठंडे बुर्ज में और वो हड्डियो को चीर देने वाली सर्दी।

वज़ीर खान ने माता गुजरी और छोटे साहबजादो को ठंडे बुर्ज में रख कर जुलम की सारी हदें पार थी करदी।


बाबा ज़ोरावर सिंह जी और बाबा फतेह सिंह को अपने महल में बुलाया।

जान बूझ कर बड़े गेट को बंद करवा के छोटा गेट खुलवाया।


वज़ीर खां को लगा था दोनों छोटे साहबजादो झुक कर आएंगे।

लेकिन वज़ीर खां को नहीं पता था ये तो गुरु गोबिंद सिंह के बेटे है जब भी आएंगे झुक कर नहीं सीना तान के आएंगे।


काज़ी ने कहा था सर झुकाओ ये नवाब वज़ीर खां है।

तब छोटे साहबजादो ने कहा था मासूमों पे ज़ुल्म करना ये तो दरिंदगी की इंतेहा है।


इस्लाम धर्म कबूल कर लो वर्ना मार दिये जाओगे कह कर बहुत गया था साहबजादो को डराया।


तब छोटे साहबजादो ने ये कहा था की मरना हमें मंजूर है हमारे दादा जी गुरु तेग बहादुर जी ने तो दूसरे धर्म को बचाने के लिये अपना सीस तक कटवाया।


मुगल सेना फिर भी उनसे ना इस्लाम धर्म कबूल करवा पाई तो हम इस्लाम धर्म कैसे कर ले कबूल।


जो सजा सुनानी है सुना दो हमें अपना धर्म बदलने की हमसे बातें करो ना तुम फिजूल।


ये बात सुनकर वजीर खां इतने गुस्से में आया काज़ी से दोनों छोटे साहबजादो बाबा ज़ोरावर सिंह जी और बाबा फतेह को जिंदा दीवारों में चुनवाने का फतवा पढ़वाया।


लेकिन होंसले और दोनों के चेहरे की मुस्कान देखकर वज़ीर खान भी एक बार था घबराया। 


अपनी मौत की खबर सुनके भी दोनों साहबजादो ने जो बोले सो निहाल सात श्री अकाल का जैकारा लगाया ।


अगले दिन साहबजादो ने दीवारों में शहादत पाई।

आंखे भर ली थी बाबा जोरावर सिंह ने जब उनसे पहले उनके छोटे भाई बाबा फतेह सिंह ने थी शहादत पाई।

ये सदमा माता गुजरी भी सह ना पाई।

रूह कांप गई देखने वालों की लेकिन वज़ीर खां को जरा भी शर्म ना आई।


साहबजादो की ख़बर ने बंदा सिंह बहादर के दिल में बदला लेने की ऐसी आग लगाई।


फिर बंदा सिंह बहादर ने वज़ीर खां की ईंट से ईंट खड़काई।

मौत के घाट उतार के वज़ीर खां को बंदा सिंह बहादर ने गुरु गोबिंद सिंह को दी हुई अपनी कसम निभाई।


पता नही क्या सोच के प्रभु,नीलू दीदी और मेरी मां ने इतने बड़े गुरु और उनके परिवार पर अपने नादान बेटे सनी से ऐसी पोस्ट लिखवाई✍️

No posts

Comments

No posts

No posts

No posts

No posts