माँ's image
Share0 Bookmarks 9 Reads0 Likes

माँ के अरमानों को मैंने

चूल्हे में जलते देखा है

माँ के जज़्बातों को मैंने

पर्वत से लड़ते देखा है


घूँघट की रस्मों को

क्या ख़ूब निभाया उसने

बेटी से बहू बनने का

हर फ़र्ज़ निभाया उसने

देर रात सिरहाने

आंखों को मलते देखा है

हाँ मैंने माँ के आंसुओं को 

सूरज सा ढलते देखा है


हाँ देखा है मैंने

ममता की सूरत को

हाँ देखा है मैंने

दया की मूरत को

उसके भोले मन में मैंने

दीपक को जलते देखा है

हृदय से निर्मल धारा की

हिमालय पिघलते देखा है


माँ की पीड़ायें 

तो बस माँ ही जाने

जग ने सुनाएं जिसे लाखों ताने

बचपन का पहला स्वर ही तो माँ होता है

उसके आँचल में ही बचपन जवां होता है

न जाने कितनों के हांथों से मैंने

उस आँचल को जलते देखा है

चंद रुपयों और अय्याशी के ख़ातिर

मैंने माँ को मरते देखा है।

मैंने माँ को मरते देखा है 


साहिल मिश्रा


No posts

Comments

No posts

No posts

No posts

No posts