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मैं हूँ सत्य वो है असत्य

एक छोटा सा विवाद ले कर खड़ी हूँ

प्रपंच कपट के कोलाहल में

मैं भीषण अंतर्नाद ले कर खड़ी हूँ


जो तुम सुनना न चाहो किसी शर्त पर

मैं सच्ची वो बात ले कर खड़ी हूँ

अरे देखो मुझको निष्ठुर जन तुम

मैं अंतर्मन में आघात ले कर खड़ी हूँ


नारी हूँ , मैं हूँ माता

मैं धैर्य अपरम्पार ले कर खड़ी हूँ

दुःख में हूँ, मैं कलियुग में हूँ

अपने पीछे भ्रष्ट संसार ले कर खड़ी हूँ


चोला पहने है सफ़ेद जो

उसके काले कृत्य विकराल ले कर खड़ी हूँ

मैं ही दुर्गा , मैं ही शक्ति

उस नीच का मैं काल ले कर खड़ी हूँ


तुम सत्य जान कर सत्य छुपाते

मैं गहरा काला द्वेष ले कर खड़ी हूँ

आक्रामक बनी मैं बनी शिखंडी

अम्बा का केवल वेश ले कर खड़ी हूँ


जो बचाते हैं दुष्ट को

उनके लिए पुरज़ोर विरोध ले कर खड़ी हूँ

घायल हूँ, अपमानित भी हूँ

मैं रुद्र सा क्रोध ले कर खड़ी हूँ


ख़रीद फ़रोख़्त की मृत भूमि में

मैं निश्छल निस्वार्थ प्राण ले कर खड़ी हूँ

तुम राक्षस सेना रख लो सारी

मैं अपने साथ भगवान ले कर खड़ी हूँ

 

मैं हूँ हिस्सा इस अंधकार का

तिमिर सा काला मलाल ले कर खड़ी हूँ

पर आशा भी है नयी सुबह की

देखो मैं क्रांति की मशाल ले कर खड़ी हूँ


— ह्रषीता ‘दिवाकर’

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