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क्या रफ़्तार थी जब रगों में था

उबाल जब हदों में था

नफ़रतों में जब बेइन्तिहा उबल गया

चश्मदीद दहल गया

कब आँखों में उतरा

कब ज़मीन पर बिखर गया


साथ साथ बस ख़याल 

और सवाल बह रहा

अल्फ़ाज़ क्या कहने आय थे

क्या अनसुना रह गया

प्यार की भी ज़ुबान थी

हथियार ये क्या कह गया


जिस पर खौला छलका 

मुझ सा ही दिख रहा

उस घर भी सोग है

मेरे घर भी मातम दिख रहा


इससे बेहतर 

दिलों में रहकर

मिलते अगर मिलना ही था

रगों में पूरते कमी

हिफ़ाज़त में एक दूसरे की

रिसते अगर रिसना ही था


अब यूँ ख़ाक में मिलकर

मिलकर भी क्या मिला

जिससे नफ़रत फ़र्क़ था बहाना था मुझे

आख़िर बहकर भी तो मुझमें ही आ मिला


काश थोड़ा सहा होता

शायद कम बहा होता

काश मक़सद नेक रहा होता

शायद वतन के लिए बहा होता


~ *खून* ~

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