माँ's image
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इस अंजान शहर में कैसे जीता हूं मत पूछ
तुझ से दूर जाना बहुत अख़रता है माँ
महंगे से महंगे होटलों में खाकर देख लिया
ये पेट तेरे हाथों की रोटियों से ही भरता है माँ
इक अरसा गुज़रा है रात भर जागते जागते 
तेरी मीठी लोरी सुनने का मन करता है माँ
अच्छे अच्छों को धूल चटाने वाला तेरा लाल
आज भी तुम्हारी मार से बड़ा डरता है माँ
सांझ की वो चाय कहां अब नसीब में अपने
तुम रोज़ याद आती हो जब दिन ढ़लता है माँ
ख़ुद-ब-ख़ुद मुकम्मल हो जाती है मेरी ग़ज़ल
मैं बस कागज़ पर तुम्हारा नाम लिखता हूं माँ

    - हर्ष सक्सेना

     

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