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"तू तस्वीर है इस जहांँ के सबब की " (कविता)

हरिशंकर सिंह 'सारांश 'हरिशंकर सिंह 'सारांश ' March 24, 2022
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मेरी लेखनी, मेरी कविता
"तू तस्वीर है इस जहांँ के सबब की" (कविता)  प्रकृति विशेषांक 

तू तस्वीर है
इस  जहांँ के सबब की।
 मैं तेरी इबारत पै
 इतरा रहा हूंँ।

तूू गुमनाम ऐसी
कहानी है मेरी। 
मैं आंँचल में तेरे
 छुपा जा रहा हूंँ।
 मैं तेरी इबारत पै
इतरा रहा हूंँ ।

अजब दास्तांँ है
 ये तेरी मेरी।
 तू जीवन की सांँसो की
अनमिट पहेली। 

  देती तू सबको
 लेती न कुछ भी ।
जीवन की बगिया
सजाती ही रहती। 
फिजाओं पै तेरी
 मैं मन ला रहा हूँ।
 मैं तेरी इबारत पै
 इतरा रहा हूंँ  ।

येे अल्हड़ सी बेेेेलें
 दीवानी सी बगिया।
वो चंँचल हवाएँ 
 वो निश्छल सा दरिया।  

वो नदियों की कल कल
 वो झरनों  की छम छम ।
वो सावन की रिमझिम
वो बारिश का पानी ।
वो बन में फिरते
 मयूरों की बानी।

 मैं कानों से अपने
 सुन पा रहा हूंँ।
 मैं तेरी इबारत पै
इतरा रहा हूंँ।

 भँँवरोंं  की 
 गुन गुन,
 वो मेघों की मस्ती।
 उपवन में फिरते
हिरणों की हस्ती।

वो फूलों का खिलना
वो कलियों की हलचल। 
मैं कोयल के गीतों पै
 शिहरा रहा हूंँ।
मैं तेरी इबारत पै
 इतरा रहा हूंँ।

 हरिशंकर सिंह सारांश 
  

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