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थोड़ा सा थका हूंँ मगर रुका नहीं हूंँ।

हरिशंकर सिंह 'सारांश 'हरिशंकर सिंह 'सारांश ' July 8, 2022
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मेरी लेखनी मेरी कविता
 थोड़ा सा थका हूंँ मगर रुका नहीं हूंँ
(कविता)

थोड़ा सा थका हूंँ
 मगर रुका नहीं हूंँ।

जिंदगी की हालातों के आगे
झुका नहीं हूंँ 
कांच के रिश्ते लिए फिर रहा हूंँ
 पत्थरों के शहर में
 ठोकरें बहुत खाईं
 मगर झुका नहीं हूंँ।

तेरी यादों को
 दिल से लगा कर रखा है
भूला नहीं हूंँ।
 यूंँ तो गम की बारिश
हो रही है मुझ पर
 पर मेरे रब में भीगा नहीं हूंँ।

 जितने थे तूफान गुजर गए
 तेरी रहमत से
जाने किस की दुआ है
अभी तक जल रही है लौ
 बुझा नहीं हूंँ।
 थोड़ा सा रुका हूंँ
मगर झुका नहीं हूंँ।

हरिशंकर सिंह सारांश   

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