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कहीं प्यासा न मर जाऊंँ? (कविता)

हरिशंकर सिंह 'सारांश 'हरिशंकर सिंह 'सारांश ' August 12, 2022
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मेरी लेखनी मेरी कविता
 कहीं प्यासा न मर जाऊंँ
( कविता)

रंग दो रंग में अपने
कोरा हूंँ सँँवर जाऊंँ।
होठों पर होठ रख दो ,
कहीं प्यासा न मर जाऊंँ।।

चूम कर बदन को होठों से
 अपने गुलाबी कर दो,
लबों से छू लो
मुझे शराबी कर दो।।

गुलाब की कलियों
की तरह  है बदन मेरा,
आहिस्ता चूमना मुझको 
बदन में सिहरन होती है ।।

हरिशंकर सिंह सारांश       

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