तुम्हारी बातें's image
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हंसते थे हर रोज़ ही जी भर के

बाद मुद्दत के देखा तुम्हे, तो मुस्कुराई आंखें


गुलदान करते नहीं इंतज़ार अब फूलों का

घर के कोनों में महकती हैं तुम्हारी बातें


न जाने क्या पिघल गया था मन के अंदर

बन गई थीं क्यूं समंदर आंखें


मांग ली है उस ख़ुदा से मोहलत मैंने

करनी है तुमसे अब उम्र भर की बातें
 

कबसे तक रहीं थी रास्ता ये तुम्हारा

कि बन गई हैं ख़ुद इंतज़ार आंखें


उठाई थी कलम लिखने को कहानी अपनी

और हर सफ़हे पर लिख दी, तुम्हारी बातें ।।


: गुंजन

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