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पुस्तक समीक्षा : ड्रैगन्स गेम

Gulsher AhmadGulsher Ahmad September 4, 2021
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पुस्तक समीक्षा : ड्रैगन्स गेम 

लेखक : रणविजय 

प्रकाशक : हिन्द युग्म


“कितने और? कहाँ-कहाँ? किस रूप में?” 

कहानी के अंत से मैं इस समीक्षा की शुरुआत कर रहा हूँ। किताब में जिन परिस्थितियों के बाद ये तीन प्रश्न लिखें गए हैं, आपको सच में सोने नहीं देंगे। यदि सच में ऐसा है तो और कितने जासूस होंगे, हिंदुस्तान में कहाँ-कहाँ हो सकते है और किस रूप में?, ये सोच पाना बहुत मुश्किल काम है। इस उपन्यास में ‘रणविजय’ जी ने इतिहास की बहुत सारी घटनाओं को अपनी कल्पनाओं से ऐसे जोड़ दिया है कि ये बिलकुल भी काल्पनिक नहीं लगती और जब ये वास्तविक लगती है तो हर भारतीय का दिल कांप जाता है... क्यों?


क्योंकि इस उपन्यास के मुताबिक पोखरण, राजस्थान में ‘ऑपरेशन शक्ति’ नाम के न्युक्लियर टेस्ट के सफल होने के बाद चीन को बहुत दुख हुआ और उसने लगभग 20 साल तक का एक लम्बा जाल बिछाया। चीनी अपनी शक्ल से ही पहचान में आ जाते हैं तो उन्होंने पाकिस्तान के ‘ISI’ से मिलकर ‘पाकिस्तान मिलिट्री अकादमी’ में से चार नए नए भर्ती हुए अफसरों को चुना और फिर चीन में ट्रेंनिंग के बाद हिंदुस्तान के चार अलग-अलग शहरों में इनस्टॉल किया और उन्हें हर तरह की सुविधाएं पहुँचाकर रसूख वाला आदमी बनाया और फिर उनका हिंदुस्तान और इस देश की अर्थव्यवस्था के खिलाफ बहुत बुरे तरीके से उपयोग एक दीमक की तरह किया. ये किताब पढ़ते हुए आपको पिछले दो तीन दशकों की घटनाएँ ज़रूर याद आ जाएँगी।


रणविजय जी इससे पहले अपनी दो पुस्तकों से अपनी लेखनी का लोहा मनवा चुकें हैं. ‘दर्द मांजता है’ और ‘दिल है छोटा सा’ से पाठकों के दिल में जगह बना चुके हैं। मेरे लिए ये किताब पढना बहुत ही रोमांचित रहा क्योंकि ‘रणविजय’ जी ने हिंदुस्तान की सभी एजेंसीयों के नाम और उनका थोडा सा खुलासा किया है। 


आपको ये किताब क्यों पढ़नी चाहिए?


प्रस्तुत कृति ‘रणविजय’ जी पहला उपन्यास है। यह उपन्यास ज़्यादातर वास्तविक घटनाओं को कल्पनाओं से जोड़कर बुना गया है, जो बहुत कुछ सोचने को मजबूर करता है। यह पाठक को अपने आस-पास हो रहे अलक्ष्य परिवर्तनों के प्रति न केवल सशंकित करता है अपितु उन्हें सचेत दृष्टि रखने के लिए जागरूक भी करता है। इसमें वर्णित दाँव पेंच, परदे के पीछे होने वाली घटनाएँ हैं। अपनी ख़ुफ़िया संस्थाओं एवं उनके ऑपरेशनों पर आधुनिक राष्ट्र बहुत सारा धन क्यों खर्च करता है तथा क्यों होना चाहिए जैसे विषयों पर समझ बनाने में यह किताब मदद करती है।


मैंने खुद भी इस किताब को पढ़ते हुए पाया कि इसमें हिंदुस्तान की सभी सरकारी और गैरसरकारी एजेंसीयों का उल्लेख किया गया है तथा उनके और उनके काम के बारे में भी संछिप्त विवरण दिया गया है। इसमें हिन्दुतान के सरकारी और गैर सरकारी दफ्तरों की घूसखोरी को भी बहुत खूबसूरती से लिखा गया है जो कि एक कटु सत्य भी है. मुझे ये किताब पढने के बाद पूरी आशा है कि ये उन सभी पाठकों को पसंद आएगी जो थ्रिलर के साथ साथ सस्पेंस पढने और देखने में रूचि रखते हैं। मुझे ऐसा लगता है कि इस उपन्यास पर एक बेहतरीन फिल्म का निर्माण हो सकता है।


आपको किताब में क्या कमी लग सकती है?


किताब में क्या कमी लगेगी ये बताना ज़रा मुश्किल काम है लेकिन मुझे शुरू में पढ़ते समय थोडा सा लगा कि ये कोई इतिहास की किताब है। मैं उब रहा था लेकिन मुझे पढ़ते हुए पता था कि चीन के जाल की बात की गयी है तो ज़रूर कहानी की कोई एक खुबसूरत संरचना होगी। जैसे जैसे कहानी खुलती है तो जिज्ञासा बढती जाती है। एक बात समझ नहीं आई कि जासूस के द्वारा SSB क्लियर करवा कर सेना की तीनो विभागों में जिन लडको को भर्ती करवाया गया उनकी क्या भूमिका रही... 


लेकिन कहानी के अंत के तीन सवाल “कितने और? कहाँ-कहाँ? किस रूप में?” से इस किताब के एक दुसरे भाग की आशा जग जाती है। आपको पढ़ते हुए ये लगेग कि इस उपन्यास में कुछ साल बहुत संछेप में ही लिख दिया गया है लेकिन जब आप पूरी कहानी ख़त्म कर के अंत में “लेखकीय” पढेंगे तो वहाँ लेखक ने ये कहाँ है कि वह इस किताब को महागाथा नहीं बनाना चाहते थे. 

 

इस किताब की कुछ पंक्तियाँ बहुत पसंद आयी...


• काला को सफ़ेद कहने के लिए सिर्फ सरकारी मोहर की ज़रूरत होती है, उसके बाद मजाल है जो फिर कोई काला को काला सिद्ध कर सके?


• मानव मस्तिष्क की उड़ान जहाँ तक जा सकती है वहाँ तक चीजे सम्भव हैं, उसे बस इच्छाशक्ति की आवश्यकता होती है.


• देश के लिए महत्वपूर्ण किसी भी व्यक्ति, संस्था, अथवा संसाधन का नष्ट होना, संदिग्ध दृष्टि से देखा जाना चाहिए और उसकी जाँच प्रोफेशनल तरीके से होना चाहिए.


• निराश जनता को हर तरह का एक्शन आकर्षित करता है, चाहे उसके दूरगामी परिणाम कितने भी हानिकारक हो.


• अख़बार भी एक कारोबार ही होता है.


Gulsher Ahmad

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