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दर्द-ए-तन्हाई...

Dr. SandeepDr. Sandeep September 14, 2022
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वो कुछ इस तरह उमड़ती घुमड़ती मेरी ज़िंदगी में आई थी 

जैसे तपती ज़मी की प्यास बुझाने बादलों ने ली अंगड़ाई थी..

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उसकी बातें मेरे दिल-ओ-दिमाग़ पर कुछ इस कदर छाई थी

जैसे शाम की धुँधलाहट में चिराग़ की रोशनी जगमगाई थी..

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उसकी पाकीज़ा-सीरत में अलग ही रूहानियत नज़र आई थी

जैसे मोहब्बत और इबादत मेरे ज़ेहन-ओ-दिल में समाई थी..

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यारों मेरे दिल को उस दिलरुबा की चाँद सी सूरत भाई थी

उसके साथ मैंने पूरी ज़िंदगी बिताने की क़समें भी खाई थी..

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पर मेरे ख़ुदा क्यों तूने मुझपर ज़ुल्म और कयामत ढाई थी

हँसती-खेलती बित रही जो ज़िन्दगी पल भर में गँवाई थी..

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शब-ए-वस्ल से पहले क्यों मेरे हिस्से ही आई ये जुदाई थी

सैल-ए-अश्क़ में अब जो रोज़ बहती मेरी दर्द-ए-तन्हाई थी..!!

#तुष्य

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