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लहरें 


क्या यही लहरें हैं...

जो नज़ाकत से पैरों का स्पर्श कर के 

होले से गुदगुदा कर चुपचाप चली जाती हैं!


क्या यही लहरें हैं... 

जो साहिल से अठखेलियां कर के 

शर्म से पानी पानी हो कर लौट जाती हैं! 


क्या यही लहरें हैं...

जो चांद को अपने सीने से लगा कर 

रात भर प्रेम जता कर बहती जाती हैं!


ये वही लहरें हैं जिन्होंने... 

अपनी नाराज़गी जताने के लिए 

अनेक कश्तियाँ डुबोई होंगी!! 


डा. अपर्णा प्रधान 

स्वरचित, सर्वाधिकार सुरक्षित



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