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कितनी दरारें हैं 

दिल के दरो दीवार पर ...

फिर भी चांद 

अपनी यरकानी

नज़रों से 

मेरे मन की ज़मीन को 

ताकता रहता है चुपचाप...


दरारों से 

पुरवा के आखरी 

झोंके के साथ ...

चंद उम्मीदें 

पुरनम आंखों में 

उतर आती हैं...

मगर पता नहीं

फिर कोई हवा का झोंका 

सारी बंदिशे तोड़

उम्मीदों को तार तार कर

लौट जाता है ...

धूसर आकाश में

चांद यूं छुप गया...

जैसे बादलों ने 

दुपट्टे की फोंहे 

उसकी तरफ फेंकी हों ...

कुछ शक्लें 

बेकायदा हो कर 

कतरा कतरा

ख्याबों के अंधेरों में 

घुल रहीं हैं...


अब सपनों के पार 

जीना होगा ..

यहां दरारें न हो,

दिल का टूटना जुड़ना न हो,

उजाला ही उजाला हो,

दिल की ज़मीन पर

उम्मीदों का उगना 

मुरझाना न हो ,


बस यूं ही 

चांद अंधेरों को पाश पाश 

कर उजाला 

फैला रहा हो...

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