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Peace PoetryPoetry2 min read

मैं तो हूँ बंदा रब का

DhirawatDhirawat March 4, 2023
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जिसमें कोई बैर ना मज़हब मैं तो हूँ परिंदा नभ का,

मेरे धरम और जात ना पूछो कि मैं तो हूँ बंदा रब का।


बैर बढ़ाते मुल्ले-पंडित, मुझको भाती जोग-फकीरी,

दुनिया की सब राहें मेरी, मुझ को तो जचती राहगीरी।

सफ़ेदपोश मुझे पाठ पढ़ाते,

मुझे भले की राह दिखाते।

सच्चों के गिरेबान में छिपते,

मुझ को काले झूठ ना भाते।

जितने सरहद-सूबे बना लो, मैं तो हूँ बाशिंदा सब का।

जिसमें कोई बैर ना मज़हब मैं तो हूँ परिंदा नभ का,

मेरे धरम और जात ना पूछो कि मैं तो हूँ बंदा रब का।


जो कुछ भी अपना ना हो, वो लगता है बस ख़ुदगर्जी,

और जो अपने हाथ आ गया, वो हो जाता रब की मर्जी।

धर्म-समाज के ठेकेदारों,

राजनीतिक नाट्य किरदारों,

यहाँ झूठ धर्म है, झूठ जात है,

मानवता से विश्वासघात है।

भीड़-तंत्र ही लोकतंत्र है, मुद्दा हो गया दंगा सब का।

जिसमें कोई बैर ना मज़हब मैं तो हूँ परिंदा नभ का,

मेरे धरम और जात ना पूछो कि मैं तो हूँ बंदा रब का।


तुम ने अपने देश को बेचा, मानवता को गर्त में फ़ेंका,

और जो कुछ भी बस में आया, तुम ने उसका खाया ठेका।

तुम शर्म बेच गए,

तुम कर्म बेच गए,

तुम धर्म बेच गए,

तुम मर्म बेच गए।

और तो अब क्या बेचोगे, देश का हो गया कुंडा कब का?

जिसमें कोई बैर ना मज़हब मैं तो हूँ परिंदा नभ का,

मेरे धरम और जात ना पूछो कि मैं तो हूँ बंदा रब का।


धीरावत

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