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मैं क्या छोड़ आया हूं?

DhirawatDhirawat February 1, 2022
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माँ की नज़रें दरवाज़े पर टंगी छोड़ कर मैं आज घर से निकल आया हूँ।
मेरे मादरे वतन तेरी आवाज़ सुन कर मैं बांध सर पर कफन आया हूँ।

आज भी घर की रसोई में वही मीठी खुशबु और वह रंग खिलते तो होंगे,
पर जिनमें खिलाती थी मेरी माँ हलवे मुझ को, छोड़ हर बर्तन आया हूं।

वह अब्सार जो राहगुज़र को ताकते होंगे, छोड़ इंतज़ार में वो नज़र आया हूं।
वो नन्ही उंगलियाँ जो पीठ पर कीड़ी चलाती थीं, उन्हें छोड़ अपने घर आया हूं।

छोड़ कर दर को जो निकला दाने की तलाश में, किन राहों से गुज़र आया हूं।
निकला था इक अदद आशियाना बनाने को, पर छोड़ मैं इक शहर आया हूँ।

रोज़-ए-क़यामत का क्यों इंतजार करें, चल आज ही तोल कर इंसाफ करें,
पट्टी नहीं आंखों पर और दिल साफ है, आज करने हर बात दफन आया हूं।

अब उन गलियों से वास्ता नहीं मेरा, अब उन मंज़िलों तक रस्ता नहीं मेरा!
कहे धीरावत ईमान सस्ता नहीं मेरा, मैं फिर इन गलियों में आदतन आया हूँ।

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