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मैं क्या छोड़ आया हूं?

DhirawatDhirawat February 1, 2022
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माँ की नज़रें दरवाज़े पर टंगी छोड़ कर मैं आज घर से निकल आया हूँ।
मेरे मादरे वतन तेरी आवाज़ सुन कर मैं बांध सर पर कफन आया हूँ।

आज भी घर की रसोई में वही मीठी खुशबु और वह रंग खिलते तो होंगे,
पर जिनमें खिलाती थी मेरी माँ हलवे मुझ को, छोड़ हर बर्तन आया हूं।

वह अब्सार जो राहगुज़र को ताकते होंगे, छोड़ इंतज़ार में वो नज़र आया हूं।
वो नन्ही उंगलियाँ जो पीठ पर कीड़ी चलाती थीं, उन्हें छोड़ अपने घर आया हूं।

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