अदा कहते हैं's image
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दिल में हो शायद बात कोई, वह कुछ कहां कहते हैं?

और हम तो उनकी खामोशी को भी अदा कहते हैं।


वह कभी कुछ कहते नहीं किसी से,

कि वह इश्क़ में रहते नहीं किसी के,

हमें तो फ़क़त लज़्ज़त तीखे में आती है,

जिसे तुम कहते हो बेरुख़ी, लज़्ज़त-ए-जहां कहते हैं।

और हम तो उनकी खामोशी को भी अदा कहते हैं।


सख्त़ धूप में गुल बदन जलता है,

शहरों के झगड़े में चमन जलता है,

आतिश से गुलिस्तां बचा तो पाते,

लेकिन हम उन की तपिश को भी सबा कहते हैं।

और हम तो उनकी खामोशी को भी अदा कहते हैं।


इक अदद तबस्सुम से ख़िजां में बहार आए,

जो हो अबसार नम भी तो बौछार आए,

उनके हर मूड पर यूं बदल जाता है मौसम,

कोई हो सकता है परेशां, मगर हम समां कहते हैं।

और हम तो उनकी खामोशी को भी अदा कहते हैं।


बाज़ार में तेरे पर्चे हर अदा पर,

मेरे-तुम्हारे हैं चर्चे हर जु़बां पर,

मैं झूठलाता तो हूं अफवाहों को लेकिन,

होती है चिंगारी ज़रूर, जहां पर हो धुंआ कहते हैं।

और हम तो उनकी खामोशी को भी अदा कहते हैं।


आप बोलें तो वस्ल है,

आप देखें तो कत्ल है,

आप कहते हैं, मेरा क्या कसूर?

अदीब आप‌ की इन अदाओं को गुनाह कहते हैं।

और हम तो आप‌ की खामोशी को भी अदा कहते हैं।


वह रहते हैं चुप कोई कुछ भी कहे,

फिकरे कसे ज़माना मगर वो सब सहे,

धीरावत दिवाना किस-किस को समझाये?

हम जिसे कहते हैं सादगी, लोग उसे ग़ुमां कहते हैं।

और हम तो उनकी खामोशी को भी अदा कहते हैं।


चाहे वह चुप रहें तहज़ीब में,

या तकल्लुफ में लब सिलें,

फिर भी बोलते अबसार, तो क्या करें?

यूं तो वह कहते भी हैं, कि अबसार क्या कहते हैं?

मगर दिल की सारी शरारतें, निगाहों की ज़ुबां कहते हैं।

तभी उनकी खामोशी को भी अदा कहते हैं।


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