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मेरे शुरुआती मुक्तक

देवांश कौशिकदेवांश कौशिक February 16, 2022
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दिन शुरू है तुझपे , तुझपे खतम ,

    कैसे छुपाऊ तेरे दिए ये जख्म ,

       जानता हूं तू मेरी कभी न हुई

         कब तक ये दिल सहेगा तेरे ये सितम। 


मेरी कलम की अकेली स्याही थी तू ,

  जो कुछ लिखा भाव स्थाई थी तू ,

     अब कैसे मैं खुदको शायर कहूं

दिल के मुक्त एहसासों की शायरी थी 


अधूरी कहानी है क्या फायदा ,

     भावना का बता क्या कायदा ,

           अगर ठहर जाए धरा अक्ष पर तो

                भानु शशि का क्या फायदा ।



मोहब्बत के बदले मोहब्बत नहीं मिलती ,

   इनाम को छोड़िए कीमत नहीं मिलती ,

           कैसे लिखूं मैं अपने दर्द     

      दूसरों के दर्द को कद्र नहीं मिलती ।



शिला  में मिली कनिका हो तुम ,

   अचेतन हृदय की मोनिका हो तुम ,

      बार बार मैं टूटा अब गुलजार तो बना 

         अगाध जल की कर्णिका हो तुम ।


                                                             — देवांश कौशिक

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