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अमर कर गया ...

Dr. Vijit DabasDr. Vijit Dabas April 8, 2022
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काफी धीमे थे हम प्रेम की आड़ी-टेडी गलियों में
पर तुम्हारा देखना भर ही हमें तेज-तर्रार कर गया

पत्थरों के नसीब में कहां यूं पिघल कर बहना
पर तुम्हारा छुना भर ही हमें तार-तार कर गया

दरख़्त मायूस थे जब पतझड़ के मौसम में
तेरा बंधे बाल खोलना ही बसंत-बाहार कर गया

देश जहान में इतनी शराब कहां की हमे नशा दे
तुम्हारा इत्र कोनसा है जो इतना सुरूर कर गया

की इस डूबते सूरज की लाल-पीली रौशनी के साए में
तेरा रंग ऐसा निखरा के आंखें चार कर गया

की काफ़िले हजारों गुजरे होंगे तेरे सामने से डबास 
तेरा इसी गाड़ी में बैठना ग़ज़ल को अमर कर गया ।।

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