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चाक पर चलते हुए दो हाथ

हमसे पूछते है ,

अनगढ़ों के दौर मे कैसे

सृजन की बात संभव ...


चल रहे संबन्ध शर्तों पर

सतत अनुरागियों के ,

भ्रष्ट होते जा रहे आचार

अब वैरागियों के .


द्वेष के साम्राज्य मे कैसे

मिलन की बात संभव ..


बिना ब्याहे रह रहे जोड़े

नए परिवेश मे अब ,

स्नेह घटता जा रहा

उन्मत्त मिलते क्लेश मे सब .


मूल्य के आघात मे कैसे

अमन की बात संभव..


वर्जनाएँ टूटती जाती

सुखों की चाह मे ही,

कामनाएँ बढ़ रही नित

अनुकरण की राह मे ही.


मान्यता के ह्रास मे

कैसे नमन की बात संभव..


बढ़ रहे संबन्ध विच्छेदन

निरंतर आजकल,

टूटते परिवार पर

हाबी हुआ है आत्मछल.


टिड्डियों की बाढ़ मे कैसे

चमन की बात संभव...


© डा जयशंकर शुक्ल

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