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अपाहिजों की व्यथा

Chanchal JainChanchal Jain November 8, 2022
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कहते हैं
अपाहिजों की व्यथाएँ नहीं होतीं
अपाहिजों की कथाएँ भी नहीं होतीं,
उनके होते हैं घायल मन छलनी से
जिनमें रिसती हैं ग्लानियाँ,
ग्लानियाँ―
जो उन त्रुटियों के लिए होती हैं
जो उन्होनें की नहीं होतीं...
ग्लानियाँ―
जिनकी अनुभूति उनके द्वारा कराई जाती है
जो उनके अपने होने का दावा करते हैं
जिन्हें ईश्वर ने उनकी सुरक्षा के लिए भेजा होता है...
हर क्षण अपने घायल मन की आँखों से बहते अश्रुओं
को मन में ही सहेजे रहने को असहाय अपाहिज जब लिखेंगे कोई कथा
विश्वास है इतना कि उस दिन भंवर उठेगा,
ले उड़ेगा वो इस पक्ष की ग्लानियाँ अपने घेरे में और
पहुँचा देगा उस पार खड़े पक्ष के हाथों में, आंखों में...
आशा नहीं है लेकिन कि उस दिन कोई अनुभूति उन्हें छुएगी
किंतु फिर भी एक क्षण के लिए भी उसके पश्चात इधर ग्लानि ने
उठना बंद किया तो समझेंगे कि
अपाहिजों की चाहे कथा और व्यथा कोई सुने न
लेकिन उनका अस्तित्व आकर लेकर रहेगा।

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