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क्यों जबीं पे शिकन झलक जाती
हाए, ऑंखें मिरी छलक जाती

देख, मौज-ए-सराब की लत अब
तुझको लेकर कहाँ तलक जाती

मेरी राहों में काॅंटे हैं लेकिन
मेरी मंजिल सदा फ़लक जाती 

जब नहीं सुन रहा ख़ुदा तो तब 
वो सदा आस्ताँ तलक जाती

एक मुद्दत से ख़ामुशी चुप थी
अब हॅंसूॅं तो 'अजब ललक जाती 

~ सुकेशिनी बुढावने

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