कविता-श्राप's image
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ये सभ्यता खत्म होगी
बेजुबानों के श्राप
भूखे भटकते
श्वानों की सूनी
आँखों की बेबस
पुकार
दुग्ध की अंतिम बूँद
निचोड़
हाड़ कंपाने वाली
ठंड में
में मरने के लिए
छोड़ दी गई
गायों की
मूक आह से
या फिर डूब जायेगी
दुनिया के किसी कोने
किसी 
सीलन भरी कोठरी
किसी
रात के भयावह अँधेरों में
सिसकती तमाम
स्त्रियों के आँसुओं में
 निश्चय ही
ये सभ्यता खत्म होगी...
बृजेश कुमार 'ब्रज'

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