कविता-श्राप's image
Share0 Bookmarks 37 Reads0 Likes
ये सभ्यता खत्म होगी
बेजुबानों के श्राप
भूखे भटकते
श्वानों की सूनी
आँखों की बेबस
पुकार
दुग्ध की अंतिम बूँद
निचोड़
हाड़ कंपाने वाली
ठंड में
में मरने के लिए
छोड़ दी गई
गायों की
मूक आह से
या फिर डूब जायेगी
दुनिया के किसी कोने
किसी 
सीलन भरी कोठरी
किसी
रात के भयावह अँधेरों में
सिसकती तमाम
स्त्रियों के आँसुओं में
 निश्चय ही
ये सभ्यता खत्म होगी...
बृजेश कुमार 'ब्रज'

No posts

Comments

No posts

No posts

No posts

No posts