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बहोत कुछ कहना अब भी बाकी हैं

Binay kumar SinghBinay kumar Singh April 7, 2022
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गुम मै अपनी सोच की गहराइयों में 

कि क्या ऐसी भी वो ख्वाहिश थी मेरी 


कुछ पाया तो नहीं आज तक

और खोता ही खोता चला जा रहा हूँ।


कहाँ मैं भी नाम बनाने निकला था 

और अपनी पहचान तक को गवा बैठा हूँ


कहना हैं बहोत और बहोत कुछ 

जो आज भी मैंने खुद में छुपा रखा हैं


ऐसे तो मैं खुली किताब हूँ पर 

बहोत कुछ कहना अब भी बाक़ी हैं।


- विनय

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