विरह की अग्नि's image
Share0 Bookmarks 17 Reads0 Likes


बिंदी माथे पे सजाकर कर लिया सोलह श्रृंगार ।

प्राणप्रिय आपकी राह में बिछाई पुष्प वह पगार ।।

शय्या पर भी चुनट पड़ी बोले सारी सारी रात ।

नींद भी नहीं आ रही  जगन मिलन की बात ।।

विरह वेदना तन को जलाएं नहीं कोई उपचार ।

प्राणाधार के साथ में मेरे जीवन का हैं आधार ।।

मन की यह यन्तणा क्या बताऊं सजाना आज ।

ओष्ठ चंचल चल रहे , सारंगी बिखरे तय साज ।।

क्षीर - क्षीर की खीर भी बनाई आपकी अबला ।

राह चलते आज मिली थीं एक कुंवारी सबला ।।

कई पहर बीत गए तकती हूं प्रीत विहार के रास्ते ।

चीं चीं चूं चूं से पुकारती है चिड़िया चिड़ा के वास्ते ।।

पणघट पानी लेने गई सखियां मिली नदी के तट ।

मन की बातें अधरो से कर रहीं पीर तीर खटपट ।।

घर आंगन में बैठी बैठी चंदा को देखूं हास विलास ।

गायन वादन नृत्य करती रचती विरह में मधुमास ।।

गीत सुनाती भंवरे उड़ा आती हूं उस बगिया में आज ।

पिया आपकी याद में तड़प रही हूं रैन बसेरा में रात ।।






No posts

Comments

No posts

No posts

No posts

No posts