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मुसाफ़िर हूँ मुझे मंजिल की तलाश है,

खाली हाथ हैं कुछ भी न मेरे पास है,


अकेला चला हूँ, मुश्किल बड़ी राह है,

आसानी से वो कहाँ मिलती है जिसकी मुझे चाह है,


पर इरादा है पक्का, मन में यह विश्वास है,

मिलेगी मुझे मंजिल मेरी दिल में यही आस है,


जो नहीं डरता है नित्य कर्म कर बढ़ जाता है,

अवश्य ही एक दिन वह अपनी मंजिल को पाता है,


"बेचैन"

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