धान , किसान और गौरैया's image
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गौरैया ने चोंच दबाया 

धान का एक बीज 

     थी भूख से बेहाल बेचारी 

     पर बच्चों के प्रेम की मारी ।

उड़ने को न जान बची थी

यही सोच परेशान खड़ी थी ।

     कृषक जो बैठा था धान के ढेर में

    चोरी न करले कोई इस फेर मे ।

जिसने धान को बोया काटा 

द्रवित हो उठा हृदय भी उसका ।

     उसकी जब ऐसी हालत देखी 

     बिखेर दिए धान एक मुट्ठी।

कुछ बच्चों के मुंह में डाली 

कुछ से अपनी भूख मिटा ली ।

    जीवन दाता है हर एक कृषक

    मेहनत इतनी करता भरसक।

रात और दिन गुजारे जब खेत

तब है भरता सबका पेट।

       ( बाबूप्रेम अमर )

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