छत's image
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उसके लहज़े को मैं लिखता था

और उसी ने वो सब लिखा हुआ पढ़ा,

मेरे कोई मुख़्तलिफ ख़्याल ना थे

मैंने बस उसकी आंखों को पढ़ा।

उसको जितना लगाव है अपने बगीचों के फूलों से,

मुझे शायद उतनी ही मोहब्बत है उसके उसूलों से।

उसके घर की वो छत जहां हम कभी मिले नहीं असल में,

क्यूं आ जाती है अकसर मेरे ख़्याल-ओ-अक्ल में।

मुझे वो छत का आंगन,दीवारें और पड़ोस के घर सब ऐसे याद है,

जैसे कईं शामे गुजार दी हो मैंने वहां

क्या अब भी वो छत पर अकेले बैठे हुए मुझे याद करता होगा,

लेकिन शायद वो अब अकेला नहीं है।

कईं यादों का एक कुनबा उसके हिस्से में है,

कईं रातों का रोना उसके हिस्से में है।

अब फिर मैंने कुछ लिखा है उसके लिए,

अभी मैंने फिर कुछ उसके बारे में पढ़ा।

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