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Romantic PoetryPoetry1 min read

रंगीं क़िस्मत

AvviAvvi February 20, 2022
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अपनी भी रंगीं क़िस्मत, कुछ और होती...

नज़र में तिरी इज़्ज़त, कुछ और होती...

 

की होती मिरी क़द्र-ए-मुहब्बत तुमने,

ज़िन्दगी की तबियत, कुछ और होती...

 

सिसकते न हम, क़ैद-ए-तनहाई में,

न जुबां पे शिकायत, कुछ और होती...

 

न ही आते तुम, ज़ीस्त में मेरी अगर,

तुझे न-चाहने की हसरत, कुछ और होती...

 

रू-ब-रू हो जाते,  यक-लख़्त अगर,

इस चहरे पे रंगत, कुछ और होती...





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