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जिन्दगी


"जो उम्र थी जिन्दगी लुत्फ़ मुस्कुराने मे" !

"बाकी बची गुजरे शायद सिस्कराने मे" !


त्रप्त होती थी इन्द्रिया तब सताने मे, 

मन हर्ष से हर्षता फिर फिर मनाने मे..I

यही थी उम्र उल्लासी लुत्फ़ लेने की,

गुजरे पल शायद न आयेंगे ज़माने मे..II


वर्षा भीगी मिट्टी को दुजे पीठ रगडने मे,

खेल खेल मे लड़ने और झगड़ने मे ..I

खुद सैतानी कर के दुजे हंसी उड़ाने मे,

गुजरे पल शायद न आयेंगे ज़माने मे ..II

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