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कुछ लिखता हूँ

Ashish PandeyAshish Pandey September 18, 2021
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वर्षो से मन में इच्छा थी, कुछ लिखता हूँ कुछ लिखता हूँ ,

बिखरी आकांक्षाओं को एक रूप में बन्धित करता हूँ ।

पर द्वन्द असीमित था मन में, क्या लिखूं कहा आरम्भ करुँ,

क्या समझाकर क्या दिखलाकर, चंचल मन को स्तम्भ करूँ |

क्या लिखूँ विश्व में व्याप्त क्लेश, या ममता का कोई रूप लिखू,

पीपल की छाया को देखू, क्या चिल-चिल करती धूप लिखूं |

क्या मदिरा की महिमा लिख दूँ, जिसने जीवन आसान किया,

या जल की बढ़ती दुर्लभता, जिसने सहस्त्र बलिदान लिया ।

हलधर की पीणा का वर्णन, है कर सकता क्या लेख कोई,

मानव का तांडव इस भू पर, क्या रहा गगन से देख कोई ।

कुछ लिखता हूँ ऐसा जो पढ़, चहु ओर प्रेम संभाव बढ़े

मनु को जिसने है शील दिया , वो भी पढ़ इस पर गर्व करे ।

हूँ बहुत दिनों के बाद आज लिखने का साहस कर पाया

मन की प्रियतम इस इच्छा में, कुछ रंग शब्द से भर पाया |

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