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परिश्रम -राह मंजिल की ओर

ApurwApurw December 14, 2021
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जिस राह जाने से डरता था

आज उसी राह पर बैठा हूं।

जिस चिंगारी से डरता था

आज उसी की आग अपने सीने में दबाए बैठा हूं।

जिस रात के अंधेरे में डरता था

आज उसी की चांदनी में शैर पर निकला हूं।

जिस तूफ़ान से घबराता था

आज उसी तूफान अपनी उड़ान भर रहा हूं।

जिन सवालों से घबराता था

आज उन्ही का उत्तर खोज आगे बढ़ रहा हूं।

जिस चोट पर रोता था

आज उसी पर मरहम लगा आगे बढ़ रहा हूं।

जिस अकेलेपन से भागता था

आज उसी को दोस्त बना बैठा हूं।

जिस नदी की गहराई से डरता था

आज उसकी उल्टी धारा में तैर रहा हूं।

जिस मंजिल से भागता था

आज उसी मंजिल की ओर भाग रहा हूं।

जिस हाथों की लकीर पर भरोसा था 

आज उन्ही लकीरों पर कलम चला अपनी तकदीर लिख रहा हूं।

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