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2014-15 में लिखी एक कविता


चाँद
दाग साथ लिये मगर फिर भी बेदाग,
कभी टूटी छतो से टपकता,
कभी बादलो में लुका छुपी खेलता,
कभी सर्दियों में सिकुड़ता,
कभी रास्तो में साथ चलता।
चाँद
हमेशा बचपन से किश्तों में मिला,
कभी रोटी में मिला,
तो कभी रिश्तो (मामा) में मिला,
मोहब्बत के अल्फाजो में मिला,
शहीदो के जनाजो में मिला।
चाँद
अब इश्क की इबादत है
गुमसुम, खोयी रात में
समुन्दर में खोयी मायूसी में
बेसब्री के इन्तजार में
खोये हुए प्यार के इश्तेहार में.
चाँद
मगर अब चाँद डरा है
सब कुछ बिक रहा है
अभी तो चाँद की बस जमीं बिकी है,
अगर चाँद बिका तो ….
सोचो क्या क्या बिकेगा ? क्या क्या बिकेगा ?

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