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वो पत्थर हो गया है पिघलता ही नही।

Ankit KannaujiaAnkit Kannaujia November 11, 2021
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नफ़रत उसके अंदर का निकलता ही नही

अब वो पत्थर हो गया है पिघलता ही नही


हैं उसके कुछ चाहने वाले भी उसको मगर

मैंने सुना है कि अब वो किसी से मिलता ही नही


देखकर आसमाँ को ये सोचता है बच्चा

आखिर आसमाँ जमीं पर उतरता क्यो नही


ये तजुर्बा भी अब हमारे किस काम का है 

जाहिल अब खुद को कोई समझता ही नही


कहने को पचास शिकायतें हैं मेरे पास

मगर दिलचस्पी अब किसी में मैं रखता ही नही


मर रहे हैं लोग खुदकुशी करके हर रोज़

सीने की जलन को कोई किसी से कहता ही नही


ख़ैरियत मेरा पूछने को लोग भरे पड़े हैं

मगर मिज़ाज कोई मेरा समझता ही नही


पाँव जिनके नही हैं वो घसीटते हुए चल रहा

जिनके पाँव सलामत है वो चलता ही नही।

              - अंकित कन्नौजिया







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