Maa By Anjum Lucknowi's image
Share0 Bookmarks 64 Reads0 Likes

माँ

यतीमी खूँ रुलाती है बदन बेजान लगता है । 

ना हो जिस घर में माँ वह घर मुझे वीरान लगता है । 


मैं सच कहता हूँ माँ के पाक आंचल की क़सम खाकर ।

मुझे तो माँ का चेहरा इश्क का कुरआन लगाता है । 


मुझे लगती है जब ठोकर तड़प जाती है मेरी माँ ।

 जवानी में भी मादर को पिसर नादान लगाता है ।


 मेरी माँ भूकी प्यासी बैठी रहती है मेरी खातिर । 

मैं जब घर लौट आता हूं तो दस्तरख्वान लगता है ।


है माँ की गोंद पहला मदरसा और मैं मुअल्लिम हूँ । 

पडोसी यहना कहपाया तू नाफरमान लगता है । 


सितारे टाक लेती है मेरी माँ जब भी आंचल में ।

मुझे भी आस्माँ छूना बहुत आसान लगता है । 


अताअत कर नबी की और अपनी माँ को राजी कर ।

कहा किसने की बख्शिश में बहुत सामान लगता है । 


हुई जिस दिन से रुखसत मेरी मां दुनियाए फानी से । 

मेरा चेहरा भी रिश्तेदारों को अनजान लगता है । 


हर इक इंसान को होना है पैवंदे ज़मीं अंजुम ।

मुझे हर आदमी दुनिया में इक मेहमान लगता है ।


No posts

Comments

No posts

No posts

No posts

No posts