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सब्ज़-स्याह सायों के तले
जब इन राहों से गुजरते हैं
दरख़्त-ए-दिल की शाख़ों से
कुछ पीले पत्ते झड़ते हैं.
पिघलती धूप के तन्हा टुकड़े
नर्म अंधेरों में ढलते हैं.
धुँआ-धुँआ से ख़्वाबों में
तब अक्स पुराने दिखते हैं.

✍️अनिता सिंह सभरवाल

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