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जाग-जाग री सुप्त भाग्य की रेखा।

Anil Mishra PrahariAnil Mishra Prahari October 10, 2022
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जाग-जाग री सुप्त भाग्य की रेखा।

 

सोयी– सी तकदीर जाग अब

छेड़ मृदुल नवगीत- राग अब, 

हारे में  भर आस और  दम

कर   न   उन्हें  अनदेखा ।

जाग-जाग री सुप्त भाग्य की रेखा। 


यत्न  सभी  करके  देखा  है 

बनती  नहीं  भाग्य - रेखा है, 

भाग्यहीन  नर  के माथे  रच

विभव,   हर्ष    की  लेखा   ।

जाग-जाग री सुप्त भाग्य की रेखा।  


सुख-सुविधा से जो वंचित नर

उनकी भी तू करुण –व्यथा हर, 

दीन -हीन  की  पर्णकुटी  में 

भी   भर    दे    विधुलेखा। 

जाग-जाग री सुप्त भाग्य की रेखा। 


अनिल मिश्र प्रहरी। 

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