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ख़याल है

हम एक जन्म में कई जिंदगियाँ जी लेते हैं। पर जब बात लिखने की आती है तो सिर्फ अपने उन लम्हों को उतारते हैं पन्नों पर जिसमे हमें दर्द मिला हो या किन्हीं वाक्यों को ले कर ग्लानि हुई हो। ये सब करने के पीछे व्यक्ति का कोई विशेष प्रयोजन नहीं होता या वो ये सब सोंच कर नहीं करता। आखिर कौन सिर्फ उन लम्हों को संजो कर रखना चाहेगा जिसमे उसे दर्द मिला हो या जिन लम्हों में एक पल ऐसा आया हो जब वो मरना चाहता हो। नहीं ऐसा कोई नहीं करेगा लेकिन फिर भी ऐसा हमसे हमारा आंतरिक मन करवाता है।

हम चाहते हैं कि सिर्फ अच्छे लम्हें ही लिखें ताकि हमारी आने वाली पीढ़ी इसे पढ़ कर खुश हो और वो भी अपनी ज़िंदगी को खुशहाल तरीके से जियें। पर जब लिखने बैठतें हैं तब मालूमात होता है कि यार ज़िंदगी में मेरे तो कुछ अच्छा अभी तक हुआ ही नहीं तो क्या मैं लिखना छोड़ दूँ? नहीं नहीं मैं ऐसा नहीं कर सकता। मैं लिखूंगा चाहे उसमें दर्द ही क्यों न हो, ग्लानि ही क्यों ना हो। शायद ये पढ़ कर लोग वो गलतियां न करें जो मैंने की अपने जीवन में। शायद मेरी वजह से उनके पास लिखने के लिए सिर्फ अच्छे लम्हें हो। सिर्फ यही सोच कर मैं कविताओं में अपने ख्याल लिखता हूँ।

-आनन्द मोहन झा





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