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हिंदी कविताPoetry1 min read

किसी सफर में खोया हुआ सामान जैसे

Amit Radha Krishna NigamAmit Radha Krishna Nigam July 2, 2022
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किसी सफर में खोया हुआ सामान जैसे 

मैं ग़म के चेहरे पर एक मुस्कान जैसे।  


अपनों से जब भी लड़ा हूँ, जीता हूँ 

मैं जीत के बोझ की थकान जैसे।  


बचपन में सारे दोस्त जहाँ खेलते थे 

मैं मकानों के नीचे दबा वो मैदान जैसे।  


सांसें बचाने के लिए उसने शरीर बेचा 

मेरे पिताजी और उनकी पुरानी दुकान जैसे। 


दुनिया भर का पानी पिया पर प्यासा रहा  

जानती है प्यास भी अपनी पहचान जैसे।

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